पं. विपिन जैन शास्त्री की कलम से — आत्मचिंतन और सत्पथ पर चलने की प्रेरणा।
✦
मैं अकेला ही चला था
मैं अकेला ही चला था, मैं अकेला ही भला था
साथ का समझौता हमें ना रास आया, बिन प्रयोजन कौन किसके पास आया? साथ सालों साल चल भी भरोसा ना हुआ जब, भीड़ में भी एकला ही मुझे चलना पड़ा तब
तब… तब… तब समझ आया…
मैं अकेला ही चला था, मैं अकेला ही भला था
आस फिर मैं क्या करूँ उन जनों से जो स्वयं ही हैं अधूरे अनुभवों से चाह कर भी साथ मेरा दे सके ना उन हृदय के हार की झालरों से
तब… तब… तब समझ आया…
मैं अकेला ही चला था, मैं अकेला ही भला था
जब सफल सीढ़ियों पर चढ़ रहा था देख मेरा आत्मबल वो जल रहा था तब जरूरत थी तुम्हारी संवेदना की भीड़ के व्यामोह में वो भी नहीं दीं
तब… तब… तब समझ आया…
मैं अकेला ही चला था, मैं अकेला ही भला था
— विपिन जैन, 13/5/2018
✦
इन चौदह सालों में मैंने
इन चौदह सालों में मैंने, रिमझिम रिमझिम बारिश देखी। धूप छांव सी घटती बढ़ती, तेरी निर्मम ममता देखी।।
खूब भीड़ पर सूनी राहें, झूठी सच्ची आहें देखीं। अपनों द्वारा अपनेपन की, उड़ी धज्जियाँ हमने देखीं।।
वह यौवन भी देखा जिसमें, रंग बिरंगे फूल खिले थे। लेकिन धूप अधिक होने से, वे भी मुरझाने के आदी थे।।
जो भी मिला भीख में मुझको, कह ‘प्रसाद’ खुद को भरमाया। लेकिन यह भ्रम का नाटक भी, ज्यादा दिन तक काम ना आया।।
यही बात सबसे अच्छी थी, जिसने मुझे मुक्त कर डाला। सूद सहित सम्मान ले लिया, औ उलाहना भी दे डाला।।
तब जाकर सद्बुद्धि आयी, मंत्र सुखद सुख का वो लायी। हो निरपेक्ष पेक्ष चेतन को, फिर केवल निज सत्ता भायी।।
अब ना राग द्वेष उपजेंगे, सीख सुखद निज में पहुंचेंगे। जिस पथ से पा जाऊं खुद को, उसको सत्पथ पथ्य कहेंगे।।
— विपिन जैन, 11/4/2019
✦
हाँ मैं बदल रहा हूँ
हाँ मैं बदल रहा हूँ ये बदलाव मैं महसूस भी कर रहा हूँ अब ये जरूरी है या मजबूरी है वो नहीं पता पर मैं बदल रहा हूँ
ये बदलाव अचानक नहीं आया है ना जाने कितनी उम्मीदें नाउम्मीद हुई हैं ना जाने कितने बसंत पतझड़ में बदले हैं तब जाकर अन्तर्मन बोल उठा है कब तक औरों को बदलने का भाव बहेगा अब तो खुद बदल जाना ही ठीक रहेगा
दरअसल… दरअसल मुझे बैसाखियों से लगाव हो गया था डर लगता था इनके बिना चल ही नहीं पाऊँगा, इनके बिना जगह जगह ठोकरें खाऊँगा। पर अब दौड़ने की कोशिश कर रहा हूँ, खुद के पैरों से खुद ही लड़ रहा हूँ।
पर… पर बैसाखियों को ये बर्दाश्त नहीं हो रहा है, मेरा यूं चलना रास नहीं आ रहा है। उनका कहना है हिम्मत कैसे हुई तुम्हारी हमारे बिना? दो कदम भी चलने की इस दुनिया में सहारे बिना। सच पूछो तो बस इसी धमकी ने चलना सिखा दिया, अपने अंदर की शक्ति का अहसास दिला दिया।
उम्मीद करता हूँ अब कोई उम्मीद ना रहे अपने और पराये का कोई भेद ना बहे राग द्वेष की आंधी से बचता रहूं सत्पथ पर चलता रहूं…. सत्पथ पर चलता रहूं…. सत्पथ पर चलता रहूं…..