ग्रन्थाधिराज
समयसार
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स्वाध्याय ही परम तप है
स्वाध्याय के बिना शुभध्यान नहीं होता है। शास्त्र के अभ्यास के बिना संसार, शरीर, भोगों से वैराग्य उत्पन्न नहीं होता है। समस्त व्यवहार की उज्ज्वलता व परमार्थ का विचार आगम के सेवन से ही होता है।
— रत्नकरण्डश्रावकाचार, पृष्ठ 278
समयसार पर आधारित — विश्वस्तरीय सत्पथ प्रश्नमंच सीज़न-3