सत्पथ का एक सत्प्रयास

सत्पथ पाठशाला

बालक को लौकिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक व धार्मिक शिक्षा — हर रविवार, सभी आयु वर्ग के लिए, पूर्णतः निःशुल्क।

सत्पथ पाठशाला क्यों?

प्रिय साधर्मी,

वर्तमान समय में भौतिकता की चकाचौंध के कारण नयी पीढ़ी नैतिक/धार्मिक संस्कारों से विमुख हो रही है, जिसके जिम्मेदार हम और आप हैं।

हमारी शिक्षा के केन्द्र मन्दिर आज प्रदर्शन के स्थल बन गये हैं… पंथ, सम्प्रदाय, जाति आदि के नाम दूरियाँ बढ़ाने में व्यस्त हैं। दूसरी बात, हम जितने उत्सुक और समर्पित लौकिक शिक्षा तथा हॉबी क्लास के लिये हैं, उतने नैतिक/धार्मिक संस्कारों के लिये नहीं हैं, जिसके दुष्परिणाम हमारे सामने आना शुरू हो गये हैं।

सभ्य कही जाने वाली समाज भी कुरीति और व्यसन की चपेट में आ रही है। रात्रिभोजन, अभक्ष्य भक्षण जैसी कुरीति पैर पसार रही है, होटल संस्कृति हावी हो रही है, मदिरापान फैशन बनता जा रहा है… पुस्तकालय सूने हो रहे हैं, मन्दिरों में युवा नदारद हैं। ऐसे परिवेश में पाठशाला का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। जो संस्कारों की विरासत हजारों सालों से हम तक आयी है, हमारी जिम्मेदारी है कि हम उसे आने वाली पीढ़ी को सौंप कर जायें।

हमारा उद्देश्य है बालक को लौकिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक व धार्मिक शिक्षा भी प्राप्त हो, ताकि वह समाज में स्वाभिमान पूर्ण जीवन जी सके, आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर हो सके तथा औरों के लिये प्रेरणा बन सके।

“जिस पंथ चले भगवंत वही आचरिये”

सत्पथ का एक सत्प्रयास

बालकों के जीवन निर्माण हेतु सरल सोपान

1

संस्कार

मूल्य

2

सदाचार

सद्-आचरण

3

सद्विचार

शुभ विचार

4

शांतमन

शांत चित्त

प्रश्नोत्तर

सत्पथ द्वारा वीर वाटिका में आयोजित वर्कशॉप (पाठशाला) के विषय में

यह किस आयु वर्ग के लिए है?

यह सभी आयु वर्ग के लिए है। अलग-अलग ग्रुप की अलग-अलग कक्षाएँ यहाँ लगेंगी।

यह कब से कब तक चलेगी?

प्रति रविवार जुलाई से जनवरी तक (फरवरी-मार्च परीक्षा समय) तथा अप्रैल-मई के माह में कैम्प — इस तरह लगभग पूरे वर्ष चलेगी।

क्या यह सशुल्क होगी?

नहीं, यह पूर्ण रूप से निःशुल्क होगी।

क्या यातायात सुविधा उपलब्ध की जाएगी?

हाँ, सभी पंजीकृत बालकों के लिए यह व्यवस्था की जायेगी।

जब यह निःशुल्क है तो यातायात, अल्पाहार, किट और पुरस्कारों की व्यवस्था कैसे होगी?

पंचमकाल के अंत तक जिनशासन चलना है, अतः कोई न कोई दातार मिल ही जाते हैं। अच्छे कार्य को देखकर लोग बिना मांगे ही देते हैं।

वाह! फिर तो सभी आ जायेंगे, तो जगह कम पड़ जायेगी?

सबका इतना पुण्य नहीं होता कि जैन दर्शन को गहराई से समझ सकें। स्कूल की शिक्षा पर लाखों खर्च होते हैं पर धार्मिक शिक्षा पर सोचना पड़ता है। नयी पीढ़ी में संस्कार नहीं हैं — ऐसी चिंता करने वाले भी कई बार पाठशाला नहीं आते/भेजते। हमारा निवेदन है — आइये, और अपने बच्चों को भेजिए।

ऐसी परिस्थिति में आपको बेचैनी नहीं होती?

नहीं… वीतराग के मार्ग पर बेचैनी कैसी — आनंद ही आनंद है। धर्मानुराग वश यह कार्य करते हैं; यह भी जानते हैं कि हमारे करने से कुछ नहीं होता, सब भवितव्य के अधीन है।

— सत्पथ, 8/4/2018

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