सत्पथ पाठशाला क्यों?
प्रिय साधर्मी,
वर्तमान समय में भौतिकता की चकाचौंध के कारण नयी पीढ़ी नैतिक/धार्मिक संस्कारों से विमुख हो रही है, जिसके जिम्मेदार हम और आप हैं।
हमारी शिक्षा के केन्द्र मन्दिर आज प्रदर्शन के स्थल बन गये हैं… पंथ, सम्प्रदाय, जाति आदि के नाम दूरियाँ बढ़ाने में व्यस्त हैं। दूसरी बात, हम जितने उत्सुक और समर्पित लौकिक शिक्षा तथा हॉबी क्लास के लिये हैं, उतने नैतिक/धार्मिक संस्कारों के लिये नहीं हैं, जिसके दुष्परिणाम हमारे सामने आना शुरू हो गये हैं।
सभ्य कही जाने वाली समाज भी कुरीति और व्यसन की चपेट में आ रही है। रात्रिभोजन, अभक्ष्य भक्षण जैसी कुरीति पैर पसार रही है, होटल संस्कृति हावी हो रही है, मदिरापान फैशन बनता जा रहा है… पुस्तकालय सूने हो रहे हैं, मन्दिरों में युवा नदारद हैं। ऐसे परिवेश में पाठशाला का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। जो संस्कारों की विरासत हजारों सालों से हम तक आयी है, हमारी जिम्मेदारी है कि हम उसे आने वाली पीढ़ी को सौंप कर जायें।
हमारा उद्देश्य है बालक को लौकिक शिक्षा के साथ-साथ नैतिक व धार्मिक शिक्षा भी प्राप्त हो, ताकि वह समाज में स्वाभिमान पूर्ण जीवन जी सके, आत्मकल्याण के पथ पर अग्रसर हो सके तथा औरों के लिये प्रेरणा बन सके।
“जिस पंथ चले भगवंत वही आचरिये”

